Friday, May 7, 2010

काश जिंदगी एक स्लेट का तुकडा होती..

स्लेट का टुकड़ा

 

उमड़ा एक बेबस सा एहसास

काश जिंदगी एक स्लेट का टुकड़ा होती।

 

और मैं नन्हा सा बच्चा बन,

जिंदगी पर मिटा मिटा कर लिखना सीखती।

 

जो मन को लगता हो भला सा,

चित्र वही हर बार खींचती।

 

यदि लिखती वक़्त की लकीरें कुछ अनचाहा

 मैं गीला  सा मन ले उसे मिटो लेती

होती अगर  ये  लिखावट गहरी  तो

 मैं आँसू  से उसे धो लेती।

 

काश जिंदगी एक स्लेट का टुकड़ा होती

जिस पर लिखे कुछ अक्षर मैं मिटा सकती

या फिर जो कभी लौट नहीं सकते

उन पलों को

एक बार फिर बना सकती

काश जिंदगी एक स्लेट का टुकड़ा होती।


मेरा मैं ही खटक गया..

कोई गुजरा हुआ लम्हा,
गुजरने से पहले जिंदगी से अटक गया,
दुःख का एक कतरा,
 जो सदियों  से आँखों में कैद था,
वो  आंसों बन  आखों से भटक गया,
गैरों को भी जो अपनों सा अपनाती थी,
उसी जिंदगी को आज मेरा मैं ही खटक गया.

Thursday, April 29, 2010

जिंदगी क्या क्या लायी

खर्च कर सुख की पोटली,
जिंदगी  दुखों का सामान,
घर ले आई,

जिसकी एक चुभन  से,
बिखर जाता है मन पारे सा ,
जिंदगी वो दुःख का मेहमान ,
घर ले आई,

थका थका था तन,
अब चुका  सा रहेगा  मन,
जिंदगी  नया ये फरमान,
घर ले आई ,

अपने ही दुखों से ,
पूरा नहीं था मन आँगन,
दूसरों के दर्द भी अब यह,
उधार ले आई,

और फिर कोई भाप न ले ,
रोई  हुई आँखों के किनारे,
मेरे रिसते गम छुपाने के लिए,
यह स्याह काजल का ,
पूरा बाज़ार घर ले आई,

जब लगा असहनीय पीड़ा का चक्र तोड़,
रोक दूं सांसों   की आती जाती चुभन,
तभी जिंदगी,
 जीने के नए से बहाने ,
 दो चार घर ले आई.

Monday, April 26, 2010

यह कुछ एहसास....




यह कुछ एहसास 






यह कुछ एहसास 
हों जैसे कोई 
दीवार पे लटकी हुई तस्वीर।

सिर्फ तेज हवा के झोंके से
थरथराते  हों जैसे 
यह कुछ एहसास।

डगमगाते हुए,
जिंदगी की कील से लटके
मन की दीवार पर
अनगिनत निशान छोड़ जाते 
यह कुछ एहसास।


जिन एहसासों का अस्तित्व 
सिर्फ तेज़  हवा तक सीमित हैं ,
दिल की दीवार पर सुशोभित,
यह कुछ एहसास ..


मेरा एहम हैं,
या मेरी बदली सोच
मन की बाँधी गाँठ हैं 
या कुछ गहरी पहुँची चोट
 मगर हैं यह बस कुछ एहसास।


संवेदनाओं के भूकंप से
जब कभी हिलती हैं
सोच की दीवारें
वहीं  कील पर लटके 
कुछ नए निशान छोड़ जातेहैं 
यह कुछ  एहसास।



Wednesday, March 17, 2010

Shattered dreams clenched tight in my hands,
life is falling apart like slipping sand,
Was this the life I was searching for?
But I cannot complaint,
what I have is what I got......

Tuesday, March 16, 2010

सहमा सा मन था,
रुकी रुकी सी सांसें थीं,
मिली जब तुमसे पहली बार,
उलझी सी मन की बातें थीं,

मन के भीतर का बच्चा डरता था,
किसी का न होगा हठ करता था,

मिले तुम और दुनिया ही बदल गयी,
प्रवाह से बहती नदी को,
मानो सागर की दिशा मिल गयी,

अनजान थे एक दुसरे से हम,
फिर जीवनसाथी बने,
साथ कुछ इस तरह गहरा हुआ,
मैं-तू से हम बनने लगे,

विशाल धरा सी तेरी प्रीत,
मेरा हर दर्द समेट लेती है,
तेरे समर्पण की ज्योति,
मेरी जिंदगी को दिशा देती है,

अचंभित हूँ कैसे मेरा व्याकुल मन,
तेरी गोद में बच्चा बन सो जाता है,
मेरा नहीं हुआ जो वो पल में तेरा हो जाता है.....

Wednesday, August 12, 2009

एक प्रवासी माँ


तिरंगा लहराना उसे सिखाया,
राष्ट्र-गान भी स्मरण कराया,
वतन से इतनी दूर एक प्रयास किया है ,
अपने नन्हे दीपक को देश दीपक बनाने का,
भारत से दूर उसे भारत-वासी रख पाने का...

अपने देश को वो नानी,दादी के घर से पहचानता है,
मात्र भूमि को मेरा लाल 'होलीडे डेस्टिनेशन' मानता है,
कैसे और कब उसमें देश भक्ति का भाव जागेगा,
कब उसे वो 'मेरा भारत' कह कर पुकारेगा,

क्या कभी छू पाएगी उसे देश की हवा,
जैसे मुझे छूती है...
क्या जान पायेगा वो कभी ,
अपने देश की मिट्टी की सोंधी सी खुशबू,
कैसी होती है....

माँ हूँ मैं उसकी, सब सिखा सकती हूँ,
आजादी के किस्से,
क्रांति की कहानियाँ सुना सकती हूँ,
मगर उनके बलिदान से ,
जो भीग जाती हैं मेरी पलकें,
क्या वो एहसास मैं ,
अपने बेटे को दिला सकती हूँ...

जानती हूँ अत्याधिक अपेक्षा कर रही हूँ,
पांच साल के बालक में ,
देश भक्ति तलाश रही हूँ,

देश के लिए और कुछ न कर सकूं शायद,
इसलिए अपने लाल को
एक देश भक्त बनाने का,
सार्थक प्रयास कर रही हूँ ....