Friday, May 17, 2013

मेरी नानी
















हूक सी उठती है सीने में,
कुछ खोने का अहसास तड़पाता है,
मन बार बार फिर,
बचपन में लौट जाता है,
वो नानी का लाड़,
वो ढेर सारा दुलार,
छूट गया था सब एक दशक पहले,
पर खोया वो सब आज पहली बार...

मेरी नन्ही हथेली पर मेहंदी से वो ,
मोर और चिड़िया बनातीं थीं,
माटी के खिलौनों को गैस पे पकाती थीं,
टौफी के प्लास्टिक की गुड़िया बना,
उस की कहानी सुनाती  थीं,
माटी से सने हाथ पैर,
बेसन से रगड़ धुलाती थीं,
कभी नानी तो कभी ,
माँ सा लाड़ जताती थीं,

हर अक्टूबर मैं करती थी यह इंतज़ार
नानी ने बुना होगा मेरे लिए ,
कौन से रंग का स्वेटर इस बार,
और कड़कती ठंड में फिर,
वो करारी सी आलू की टिक्की  बनायेंगी,
छोटी सी प्लेट में रख फू -फू कर खिलायेंगी,

मगर अब ना कभी आयेगी ,
वो आलू के पराँठों की महक,
न उठेगी तवे पे वो टिक्की की भाप,
रहेगा होठों से चिपका मगर,
उस स्नेह का यह अनूठा सा सवाद,

कहां छू पाउँगी अब वो रुई सी ठोड़ी  उनकी, 
ना फूंक में उड़ा पाऊँगी कभी ,
फिर वो चाँदी से चमकते बाल,
ना िछप के खोल पाउँगी ,
उनके साड़ी के पल्लू की वो गाँठ,
ना जूस वाले के अाते ही,
खनकेगी वो सिक्कों की आवाज़,

अब उनका स्नेह एक अहसास बन रह जाएगा,
कभी फाँस सा चुभेगा सीने में,
कभी अासूं सा टपक जाएगा,
अपने बच्चों को ,
अपनी नानी की कहानी सुनाऊँगी ,
उनकी ममतामयी छवि मैं,
अपने ही अंदर कहीं बनाउंगी,
इस प्रयास में शायद
वो ख़ालीपन  कुछ भर पाउँगी !

Sunday, September 11, 2011

सिया का अपहरण



लक्ष्मण रेखा




















मन को सिया बना कर

खींची मस्तिष्क ने एक लक्ष्मण रेखा

और जब जब अभिलाषा के रावन ने

खटखटाया ह्रदय का द्वार 

तो मैंने इस रेखा को दहकते देखा।


जानती थी लांघ कर यह रेखा

मैं भस्म हो जाऊँगी 

मगर इसके भीतर भी मैं

तिलमिलाती ही रह जाऊँगी।


क्योंकि न लौटेगा कोई राम कभी

लेकर वो धैर्य का स्वर्ण मृग

न ही मैं कभी 

किसी चंचल अभिलाषा के रावण से

छली जाऊँगी।


हूँ मैं ऐसी सिया जो

अपनी ही बनाई 

लक्ष्मण-रेखा के भीतर

अपहरण कर ली जाऊँगी।

Sunday, April 24, 2011

Train trip to childhood




Commuting in a train with Prady is always fun. More so when we invent our own games during the ride. This too was a usual trip until Pradyumn suggested a new game- game of guessing which side the gates of the Mrt will open up. Suddenly air was filled with aroma of Ma's Aaloo puri, heart was bouncing with
childhood anxiety, eyes were glowing with excitement of another holiday at grandparents' house....nostalgic me went to another world-world of my childhood. Slowly, Pradyumn's voice was fading away in the
shrieking noise of a steam engine train.

Seven years old Nidhi stepped out of the bed, rubbing sleep away from her eyes. The house still had lingering aroma of freshly fried puri's, everyone was moving in fast forward mode, the buzzing atmosphere was a rush rush to catch a train.

The journey to train station was always a balancing act of fitting all four in one rickshaw, not to forget the piles of luggage. The anxiety of catching a train was quite a thrill for me and my brother,competing with each other for window seat was as serious as wining a trophy. The trophy of fresh breeze patting your cheek, the beautiful back drop switching every mile from a village to city. Seeing litlle kids chasing the train and running their own race.

The excitement of shouting "chai le lo" like chaiwalas in the train alley and getting embarrassed when someone would stop us and say "arey suno ek chai dena". Anticipating what new toy or candy will the
salesboy bring at the next station, Trying to predict whether or not to ask mom to buy that for us, that sweet temptation - what if toy coming at next station is much more fun. That strategic thinking at age of 7 was commendable. Anything was fair. Even going to an extent of spoiling the new one and crying to unbearable decibels that mom would give up and say hang on, we would buy another one at the next station. Waiting for the train to reach Mathura so that we can gang up with cousins and plan our next exciting journey to our village. The game of guessing which side of the train will the next platform will appear, and winner of the game would be the person who can guess it right along with the correct platform number........

Just when I thought Bhai was shouting, "Dekha, meri side Aaya", I realized it was Pradyumn shouting "it is on the right side, I won... I won..yeah... Let's go mom". I gathered all my memories and stepped out
of train with a heavy heart, a bit of me left there hovering in the past. Suddenly, I heard Pradyumn saying,"you know what mom, it's ok to loose sometimes. Don't be sad. Next time you can guess it right. The
trick is to remember...". I looked at him and told myself "No baby,trick is to forget and live in the present", and I was again smiling, back in my present.

Monday, January 17, 2011

सोचा आज दिल की बगिया की सफाई की जाये ,

कुछ यादों को कांटा छाटा जाए,

कुछ एहसासों को सदा के लीये बिदाई दी जाए ,

कुछ जख्म जो रिसते हैं और कुछ दर्द जो चुभते हैं ,

उन जख्मों को हटा कुछ नए एहसासों के लिए जगह की जाए,

छाटने बैठे बेमानी यादें तो पूरी जिंदगी छंट गयी,

कुछ जरुरी और कुछ बहुत जरुरी एहसासों में दिल की बगिया बट गयी,

हलकी करने बैठे थे जो दिल की टहनी उस पे नयी यादें कुछ और पनप गयीं,



एहसासों की इस बगिया के न जाने हम कब से माली थे,

सारी खटी मीठी यादें हम सालों से संभाले थे,

बदलते समय ने एहसासों को नए रंग दिए,

जो पल चुभते थे कभी शूल जैसे,

 वो भी अब फूल से महक रहे थे ,

तब लगा मन का आँगन कितना विस्तार है,

महकता है फूल सा हर एहसास,

 तो फिर क्यों हो किसी भी गुजरे पल का तिरस्कार है,

हर गुजरा एहसास एक नयी राह दिखा गया,

हर दर्द जीने का सबक कोई सिखा गया!

Saturday, January 8, 2011

2010

जिंदगी की दीवार पे एक और साल का कैलेंडर लटक गया ,
कुछ पन्ने ख़ुशी के थे कुछ पे ग़मों का रंग छिटक गया,
कुछ यादें हमने नयी बनायीं ,
कुछ पुरानी अतीत से चुराईं,
लम्हे कुछ अपने अपनों से बांटे और कुछ तन्हाई में काटे ,
कभी अनुभवी पतंगबाज़ की पतंग सा उड़ा मन,
कभी कटी पतंग सा भटक गया ,
और जिंदगी की दीवार पे एक और साल का कैलेंडर लटक गया ,

कुछ अतीत के दरवाज़े हमने बंद किये,
कुछ दिल की खिडकियों के पट नए खोले ,
दर्द पुराने कुछ जिंदगी को नए सबक दे गए ,
खुशियों के पल कुछ जिंदगी में मिठास से घुले
लम्हे कुछ हमसे बने और कुछ लम्हों ने हमे बदल दिया ,

कभी जिंदगी ने हमारा हाथ थामा,
तो कभी हमारी राह का रुख बदल दिया ,
और इस उधेड़बुन में जिंदगी का एक और पन्ना पलट गया ......

Thursday, December 16, 2010

अधूरे एहसास जिन्हें शब्दों की दुनिया नहीं मिली

बहुत दिन से एक कशमकश  सी है,
कभी शब्द नहीं मिलते,
कभी भावनाएँ ने खो दी जमीन है,
और कभी जब दोनों में बैठा ताल मेल,
तो कोई कविता नहीं पनपी है...

कुछ एहसास जो अनकहे से होठों में दबे हैं,
और कुछ निराकार ह्रदय में बहे,
कुछ  एहसास जो सोच की सीमा से परे हैं,
और कुछ जो मन के बांधे बंधन में बंध गए,
इन सभी अधूरे एहसासों को,
 शब्दों की दुनिया नहीं मिली है....

परत दर परत समेटती जा रही हूँ,
यह  आधे अधूरे से कुछ  एहसास,
सोचती हूँ,
कहाँ  सूखी मिट्टी से मूर्त कोई बनी है,
चाहा भी कुछ बूँद पलकों से ले उधार,
इन एहसासों को नम कर एक आकार रच दूं,
मगर पलकों  में अब नमी भी  नहीं मिली है.....

Friday, May 7, 2010

काश जिंदगी एक स्लेट का तुकडा होती..

स्लेट का टुकड़ा

 

उमड़ा एक बेबस सा एहसास

काश जिंदगी एक स्लेट का टुकड़ा होती।

 

और मैं नन्हा सा बच्चा बन,

जिंदगी पर मिटा मिटा कर लिखना सीखती।

 

जो मन को लगता हो भला सा,

चित्र वही हर बार खींचती।

 

यदि लिखती वक़्त की लकीरें कुछ अनचाहा

 मैं गीला  सा मन ले उसे मिटो लेती

होती अगर  ये  लिखावट गहरी  तो

 मैं आँसू  से उसे धो लेती।

 

काश जिंदगी एक स्लेट का टुकड़ा होती

जिस पर लिखे कुछ अक्षर मैं मिटा सकती

या फिर जो कभी लौट नहीं सकते

उन पलों को

एक बार फिर बना सकती

काश जिंदगी एक स्लेट का टुकड़ा होती।


मेरा मैं ही खटक गया..

कोई गुजरा हुआ लम्हा,
गुजरने से पहले जिंदगी से अटक गया,
दुःख का एक कतरा,
 जो सदियों  से आँखों में कैद था,
वो  आंसों बन  आखों से भटक गया,
गैरों को भी जो अपनों सा अपनाती थी,
उसी जिंदगी को आज मेरा मैं ही खटक गया.

Thursday, April 29, 2010

जिंदगी क्या क्या लायी

खर्च कर सुख की पोटली,
जिंदगी  दुखों का सामान,
घर ले आई,

जिसकी एक चुभन  से,
बिखर जाता है मन पारे सा ,
जिंदगी वो दुःख का मेहमान ,
घर ले आई,

थका थका था तन,
अब चुका  सा रहेगा  मन,
जिंदगी  नया ये फरमान,
घर ले आई ,

अपने ही दुखों से ,
पूरा नहीं था मन आँगन,
दूसरों के दर्द भी अब यह,
उधार ले आई,

और फिर कोई भाप न ले ,
रोई  हुई आँखों के किनारे,
मेरे रिसते गम छुपाने के लिए,
यह स्याह काजल का ,
पूरा बाज़ार घर ले आई,

जब लगा असहनीय पीड़ा का चक्र तोड़,
रोक दूं सांसों   की आती जाती चुभन,
तभी जिंदगी,
 जीने के नए से बहाने ,
 दो चार घर ले आई.

Monday, April 26, 2010

यह कुछ एहसास....




यह कुछ एहसास 






यह कुछ एहसास 
हों जैसे कोई 
दीवार पे लटकी हुई तस्वीर।

सिर्फ तेज हवा के झोंके से
थरथराते  हों जैसे 
यह कुछ एहसास।

डगमगाते हुए,
जिंदगी की कील से लटके
मन की दीवार पर
अनगिनत निशान छोड़ जाते 
यह कुछ एहसास।


जिन एहसासों का अस्तित्व 
सिर्फ तेज़  हवा तक सीमित हैं ,
दिल की दीवार पर सुशोभित,
यह कुछ एहसास ..


मेरा एहम हैं,
या मेरी बदली सोच
मन की बाँधी गाँठ हैं 
या कुछ गहरी पहुँची चोट
 मगर हैं यह बस कुछ एहसास।


संवेदनाओं के भूकंप से
जब कभी हिलती हैं
सोच की दीवारें
वहीं  कील पर लटके 
कुछ नए निशान छोड़ जातेहैं 
यह कुछ  एहसास।



Wednesday, March 17, 2010

Shattered dreams clenched tight in my hands,
life is falling apart like slipping sand,
Was this the life I was searching for?
But I cannot complaint,
what I have is what I got......

Tuesday, March 16, 2010

सहमा सा मन था,
रुकी रुकी सी सांसें थीं,
मिली जब तुमसे पहली बार,
उलझी सी मन की बातें थीं,

मन के भीतर का बच्चा डरता था,
किसी का न होगा हठ करता था,

मिले तुम और दुनिया ही बदल गयी,
प्रवाह से बहती नदी को,
मानो सागर की दिशा मिल गयी,

अनजान थे एक दुसरे से हम,
फिर जीवनसाथी बने,
साथ कुछ इस तरह गहरा हुआ,
मैं-तू से हम बनने लगे,

विशाल धरा सी तेरी प्रीत,
मेरा हर दर्द समेट लेती है,
तेरे समर्पण की ज्योति,
मेरी जिंदगी को दिशा देती है,

अचंभित हूँ कैसे मेरा व्याकुल मन,
तेरी गोद में बच्चा बन सो जाता है,
मेरा नहीं हुआ जो वो पल में तेरा हो जाता है.....

Wednesday, August 12, 2009

एक प्रवासी माँ


तिरंगा लहराना उसे सिखाया,
राष्ट्र-गान भी स्मरण कराया,
वतन से इतनी दूर एक प्रयास किया है ,
अपने नन्हे दीपक को देश दीपक बनाने का,
भारत से दूर उसे भारत-वासी रख पाने का...

अपने देश को वो नानी,दादी के घर से पहचानता है,
मात्र भूमि को मेरा लाल 'होलीडे डेस्टिनेशन' मानता है,
कैसे और कब उसमें देश भक्ति का भाव जागेगा,
कब उसे वो 'मेरा भारत' कह कर पुकारेगा,

क्या कभी छू पाएगी उसे देश की हवा,
जैसे मुझे छूती है...
क्या जान पायेगा वो कभी ,
अपने देश की मिट्टी की सोंधी सी खुशबू,
कैसी होती है....

माँ हूँ मैं उसकी, सब सिखा सकती हूँ,
आजादी के किस्से,
क्रांति की कहानियाँ सुना सकती हूँ,
मगर उनके बलिदान से ,
जो भीग जाती हैं मेरी पलकें,
क्या वो एहसास मैं ,
अपने बेटे को दिला सकती हूँ...

जानती हूँ अत्याधिक अपेक्षा कर रही हूँ,
पांच साल के बालक में ,
देश भक्ति तलाश रही हूँ,

देश के लिए और कुछ न कर सकूं शायद,
इसलिए अपने लाल को
एक देश भक्त बनाने का,
सार्थक प्रयास कर रही हूँ ....

Tuesday, August 11, 2009

माँ की व्यथा

लौटी हूँ एक माँ को सांत्वना दे कर,
अनुभव की एक बार फ़िर,
अपने ही अंश के आकार न बन पाने की व्यथा....

सूखा हुआ ज़ख्म फ़िर बहने लगा ,
खो गया जो मेरा बीज बिन पनपे ,
उसकी वेदना से ह्रदय फ़िर पीड़ित हुआ ....

वक्त ने रखे हैं मरहम ज़ख्मों पर,
मगर यह चोट नही भर पायी,
मैं उसकी भी माँ होती यह सोच कई बार,
हूक सी सीने में उमड़ आई ...

है बहुत सुंदर फूल मेरी बगिया में,
मगर दिल का वो कोना अब भी खाली है,
माँ बनने का प्रथम एहसास दिया था जिसने,
उसके न होने की पीडा अब भी बाकी है.....

उसे स्पर्श नही किया,
मगर वो अंश था मेरा ,
मैं समेट पाती उस एहसास को,
उससे पहले ही वो चल दिया ...

नियति के कठोर खेल ने,
एक माँ का आँचल हमेशा के लिए ,
छलनी कर दिया .....

Monday, June 22, 2009

बिरह का एहसास

जागा है फिर वही बिरह का एहसास,
आज फिर वही तन्हाई है,
पलकें फिर मूंदी मैनें,
आज फिर नींद नहीं आई है.....

फिर वही खिड़की है ,
वही चाँद और फिर वही खुली आँखें हैं,
तेरे पास पंख लगा उड़ आने को,
फिर मचलती मेरी वही चाहतें हैं.....

तन्हाई ने फिर विह्वल किया,
फिर वेदना शब्दों में ढल गई,
तेरी याद में ,तेरी तन्हाई में ,
फिर एक और नगम बन गई...

बदला है इतने बरस में कुछ तो बस इतना ही,
पहले प्रेमिका थी अब अर्धांगिनी हूँ,
पहले कशिश थी उसकी जो मेरा नहीं हुआ था,
अब तड़प है उसकी जिसे पा चुकी हूँ.....

राधा सी मैं हुई बावरी

मन बन गया वृन्दावन ,
आंखें गोकुल की गालीयाँ,
राधा सी मैं हुई बावरी,
जब से गया मेरा कन्हीया,

कान्हा कान्हा पुँकार रही हूँ,
इन गोकुल की गलीयों में,
केशव बहुत सताया मुझको,
तेरी इन चंचल अंखीयों ने,

सब से है तू करे ठिठोली,
मुझसे ही न बोले है,
इतना तो बेपीर नहीं ,
फिर पीर ह्रदय की क्यों न जाने है,

विह्वल तेरे बिरह में कान्हा,
कुछ ऐसी तेरी राधे है,
शूलों से चुभते उसे ,
सखियों के उल्हानें हैं,
और तेरी देरी के भी तो ,
सूझे न इसे कोई बहाने हैं,

अब और देर न करना ,
सुन लो मेरे कान्हा तुम,
वरना हो जायेगी अब,
तेरी यह राधा गुम.

Sunday, May 31, 2009

सर्वस्व तुझ पे अर्पण किया


पुष्पों से श्रृंगार किया था ,
दूध से नहलाया था,
अपनी आस्था के दीपक से प्रतिदिन,
तेरा शिवालय सजाया था....

बाल मन की अंधभक्ति से,
युवा मन की आराधना तक,
सहज पलों के खुश लम्हों से ,
सिसकी भरी रातों तक,
कण कण में ढूँढा,कण कण पे शीश झुकाया..

मगर जीवन की आपा थापी ने मुझे झुलसा दिया,
तेरी आस्था के पुष्पों को कुछ ऐसा कुम्हला दिया ,
अब अश्कों से नहलाया है तुझको ,
व्यथाओं से श्रृंगार किया है ,
सिसकीयों का नाद भर,
दर्द का दीप प्रज्वलित किया ...

ग्लानी नहीं है मुझे ,
नही मैने कोई अपराध किया ,
जो भी मिला है तुझसे,
सर्वस्व तुझ पे अर्पण कर दिया ।

Saturday, April 18, 2009

एक पृथक मैं भी हूँ...

मृत पेड़ पर हरियाती हुई बेल हूँ मैं,
अंधेरे में टिमटिमाती हुई लौ भी हूँ,
थक कर चूर हुए उन हजारों मुसाफिरों में,
एक पृथक मैं भी हूँ....

चल रही हूँ मैं इसलिए नहीं की मुझ मैं सहास है,
लड़ रही हूँ मगर यह उत्साह की लड़ाई नहीं है,
निरंतर चलायमान है मेरा संघर्ष क्योंकि,
पलट कर लौटने के लिए कोई राह ही नहीं है.....

प्रतिभा की कमी किसी मैं नहीं होती ,
ना उसे कोई मिटा सकता है,
मगर वक्त के कठिन थपेडे इन्हे दबा देते हैं,
कुछ कर गुजरने का जस्बा ही मिटा देते हैं...

चींटी की तरह मैं भी बार बार गिरती हूँ पहाड़ से,
फिर चल पड़ती हूँ उसी चोटी को छूने,
क्यों कर रही हूँ ऐसा यह जानती नहीं,
शायद मंजिल तक जाने वाली कोई सरल राह ही नहीं,
और मंजिल भी क्या है यह आभास ही नहीं .....

सब कुछ वैसा ही है,
वही संघर्ष वही लड़ाई है,
मगर आपकी प्रितिभावान निधि,
वहीँ कहीं छूट आई है.....

दुनिया के लिए मिसाल बनूँ,
यह चाह ही कहाँ है,
जब किश्त किश्त में मिल रही है जिंदगी,
तो उस में सपनो की जगह ही कहाँ हैं......

Wednesday, February 18, 2009

सही निर्णय

भटकती राहों पर चल रही थी मैं,
धुंधली दिखने लगीं थी तस्वीरें ,
मझधार तक पहुंची तो लगा ,
खो गया है किनारा छूट रही हैं मंजिलें ....

टटोला अपने मन को और समेटा,
हुआ जो अब तक वो और कब तक होगा,
सहमा सा है मन मगर में जानती हूँ,
मेरा यह निर्णय सही ही होगा.....

उठी कई निगाहें मेरे निर्णय पे,
बहुत से सवालों ने सताया,
अपनों के ले लिए लिया है यह निर्णय,
मेरे मन ने मुझे समझाया.........

राह कठिन है मंजिल भी अनजानी,
निकल पड़ी हूँ मैं सहास की बांह थामी,
कभी लगा तनहा हूँ मैं ,
कैसे चलूंगी इतनी दूर,
पलट कर देखा तो मेरे अपने ,
सब मेरे साथ थे,
छोड़ गए जो मझधार में ,
वो कब मेरे हमसफ़र, मेरे दोस्त थे...

Tuesday, February 17, 2009

तन्हाई अपनी मेरी यादों से सजा रहा है...

खामोश है सारा जहाँ,

मगर हवाओं में एक संगीत है,

थिरक उठे हैं मेरे पाँव जिन पर,

किसने छेड़ा यह मधुर गीत है...

सुन रही है जो मेरी खामोशी,

किस की यह पद्चाप है,

ऐसा लगता है दूर से,

कोई दे रहा आवाज़ है ....

क्यों बार बार होता है आभास,

जैसे कोई मुझे बुला रहा है,

तनहाइ अपनी शायद ,

मेरी यादों से सजा रहा है.......