Sunday, May 31, 2009

सर्वस्व तुझ पे अर्पण किया


पुष्पों से श्रृंगार किया था ,
दूध से नहलाया था,
अपनी आस्था के दीपक से प्रतिदिन,
तेरा शिवालय सजाया था....

बाल मन की अंधभक्ति से,
युवा मन की आराधना तक,
सहज पलों के खुश लम्हों से ,
सिसकी भरी रातों तक,
कण कण में ढूँढा,कण कण पे शीश झुकाया..

मगर जीवन की आपा थापी ने मुझे झुलसा दिया,
तेरी आस्था के पुष्पों को कुछ ऐसा कुम्हला दिया ,
अब अश्कों से नहलाया है तुझको ,
व्यथाओं से श्रृंगार किया है ,
सिसकीयों का नाद भर,
दर्द का दीप प्रज्वलित किया ...

ग्लानी नहीं है मुझे ,
नही मैने कोई अपराध किया ,
जो भी मिला है तुझसे,
सर्वस्व तुझ पे अर्पण कर दिया ।

Saturday, April 18, 2009

एक पृथक मैं भी हूँ...

मृत पेड़ पर हरियाती हुई बेल हूँ मैं,
अंधेरे में टिमटिमाती हुई लौ भी हूँ,
थक कर चूर हुए उन हजारों मुसाफिरों में,
एक पृथक मैं भी हूँ....

चल रही हूँ मैं इसलिए नहीं की मुझ मैं सहास है,
लड़ रही हूँ मगर यह उत्साह की लड़ाई नहीं है,
निरंतर चलायमान है मेरा संघर्ष क्योंकि,
पलट कर लौटने के लिए कोई राह ही नहीं है.....

प्रतिभा की कमी किसी मैं नहीं होती ,
ना उसे कोई मिटा सकता है,
मगर वक्त के कठिन थपेडे इन्हे दबा देते हैं,
कुछ कर गुजरने का जस्बा ही मिटा देते हैं...

चींटी की तरह मैं भी बार बार गिरती हूँ पहाड़ से,
फिर चल पड़ती हूँ उसी चोटी को छूने,
क्यों कर रही हूँ ऐसा यह जानती नहीं,
शायद मंजिल तक जाने वाली कोई सरल राह ही नहीं,
और मंजिल भी क्या है यह आभास ही नहीं .....

सब कुछ वैसा ही है,
वही संघर्ष वही लड़ाई है,
मगर आपकी प्रितिभावान निधि,
वहीँ कहीं छूट आई है.....

दुनिया के लिए मिसाल बनूँ,
यह चाह ही कहाँ है,
जब किश्त किश्त में मिल रही है जिंदगी,
तो उस में सपनो की जगह ही कहाँ हैं......

Wednesday, February 18, 2009

सही निर्णय

भटकती राहों पर चल रही थी मैं,
धुंधली दिखने लगीं थी तस्वीरें ,
मझधार तक पहुंची तो लगा ,
खो गया है किनारा छूट रही हैं मंजिलें ....

टटोला अपने मन को और समेटा,
हुआ जो अब तक वो और कब तक होगा,
सहमा सा है मन मगर में जानती हूँ,
मेरा यह निर्णय सही ही होगा.....

उठी कई निगाहें मेरे निर्णय पे,
बहुत से सवालों ने सताया,
अपनों के ले लिए लिया है यह निर्णय,
मेरे मन ने मुझे समझाया.........

राह कठिन है मंजिल भी अनजानी,
निकल पड़ी हूँ मैं सहास की बांह थामी,
कभी लगा तनहा हूँ मैं ,
कैसे चलूंगी इतनी दूर,
पलट कर देखा तो मेरे अपने ,
सब मेरे साथ थे,
छोड़ गए जो मझधार में ,
वो कब मेरे हमसफ़र, मेरे दोस्त थे...

Tuesday, February 17, 2009

तन्हाई अपनी मेरी यादों से सजा रहा है...

खामोश है सारा जहाँ,

मगर हवाओं में एक संगीत है,

थिरक उठे हैं मेरे पाँव जिन पर,

किसने छेड़ा यह मधुर गीत है...

सुन रही है जो मेरी खामोशी,

किस की यह पद्चाप है,

ऐसा लगता है दूर से,

कोई दे रहा आवाज़ है ....

क्यों बार बार होता है आभास,

जैसे कोई मुझे बुला रहा है,

तनहाइ अपनी शायद ,

मेरी यादों से सजा रहा है.......

Sunday, January 18, 2009

छूट गयीं हूँ मैं वहीँ जहाँ मेरा सब कुछ छूटा था,

क्या हुआ ऐसा जो मुझसे मेरा रब रूठा था....

पलकों पे सजा रही थी कितने सपने,

आँख खुली तो सब रेत का घरोंदा था......

एक ऐसा परमहंस जो मुझे विवेकानंद बना दे

तलाश रहीं हूँ मैं,
एक ऐसा परमहंस जो मुझे विवेकानंद बना दे...
जीवन के चिर सत्य इश्वर से मेरा भी परिचय करा दे,
पता नही क्यों पत्थर में राम को खोज नही पाती,
में दीप जला मन का अँधेरा मिटा नहीं पाती....

मन्दिर में दीप जला ढोल बजा मुझे इश्वर नही मिलता,
पुष्प चढा कर नाद बजा कर मेरा अन्तर्मन् नही खिलता ,
खोज रही हूँ मैं,
ऐसा दीप जो अपने उजियारे से मेरा आध्यात्म जगा दे,
एक ऐसा परमहंस जो मुझे विवेकनद बना दे..... ...

तलाश रहीं हूँ मैं ऐसा गुरु ,
जो मेरा ह्रदय झाक्जोर मेरा ख़ुद से,
और मेरे अन्तेर्मन में बस रहे मेरे राम से परिचय करा दे,
एक ऐसा परमहंस जो मुझे विवेकानंद बना दे.......

Thursday, January 15, 2009

ओ गाँधी

सो गए क्यों पहन कर कफ़न ओ गाँधी,
जागो आँखें खोल कर देखो भारत की बर्बादी,
कैसे जलेगी यहाँ मशाल अहिंसा की,
जब हर तरफ हिन्सा की आग है जल रही.....

कहीं ब्रिष्टाचार तो कहीं बमबारी ने घेरा है,
कैसे कहोगे अब गर्व से की यह भारत वर्ष मेरा है,
कभी ताज तो कभी अक्षरधाम घिर जाता है,
बम के धमाके से हर वर्ष यह देश तेरा छलनी हो जाता है,
और तेरी अहिंसा का पाठ फ़िर किताबों में सिमट के रह जाता है....

तेरे अहिंसा के पालने में देख हिंसा है पल रही,
कभी देहली का बाजार तो कभी ताज की ईमारत है जल रही,
मजहब के लिए तेरे ही देशवासी खून अपनों का बहाते हैं,
सबसे पहले इंसान हैं यह कैसे भूल जाते हैं.....

दुनिया तुझे शान्ति का मसीहा बुलाती है,
और तेरे ही इस देश में अपने मासूम बेटों के लहो -लुहान शव पे,
न जाने कितनी लाचार माँ आँसू बहाती है....

अपनी माँ के आँचल को खून से लथपथ देख,
कैसे तुम चैन की नींद सोते हो,
या तुम भी हम सब की तरह,
तन्हाई में सिसकी भर अपने इस भारत के लिए अशर बहाते हो....