Tuesday, August 11, 2009

माँ की व्यथा

लौटी हूँ एक माँ को सांत्वना दे कर,
अनुभव की एक बार फ़िर,
अपने ही अंश के आकार न बन पाने की व्यथा....

सूखा हुआ ज़ख्म फ़िर बहने लगा ,
खो गया जो मेरा बीज बिन पनपे ,
उसकी वेदना से ह्रदय फ़िर पीड़ित हुआ ....

वक्त ने रखे हैं मरहम ज़ख्मों पर,
मगर यह चोट नही भर पायी,
मैं उसकी भी माँ होती यह सोच कई बार,
हूक सी सीने में उमड़ आई ...

है बहुत सुंदर फूल मेरी बगिया में,
मगर दिल का वो कोना अब भी खाली है,
माँ बनने का प्रथम एहसास दिया था जिसने,
उसके न होने की पीडा अब भी बाकी है.....

उसे स्पर्श नही किया,
मगर वो अंश था मेरा ,
मैं समेट पाती उस एहसास को,
उससे पहले ही वो चल दिया ...

नियति के कठोर खेल ने,
एक माँ का आँचल हमेशा के लिए ,
छलनी कर दिया .....

Monday, June 22, 2009

बिरह का एहसास

जागा है फिर वही बिरह का एहसास,
आज फिर वही तन्हाई है,
पलकें फिर मूंदी मैनें,
आज फिर नींद नहीं आई है.....

फिर वही खिड़की है ,
वही चाँद और फिर वही खुली आँखें हैं,
तेरे पास पंख लगा उड़ आने को,
फिर मचलती मेरी वही चाहतें हैं.....

तन्हाई ने फिर विह्वल किया,
फिर वेदना शब्दों में ढल गई,
तेरी याद में ,तेरी तन्हाई में ,
फिर एक और नगम बन गई...

बदला है इतने बरस में कुछ तो बस इतना ही,
पहले प्रेमिका थी अब अर्धांगिनी हूँ,
पहले कशिश थी उसकी जो मेरा नहीं हुआ था,
अब तड़प है उसकी जिसे पा चुकी हूँ.....

राधा सी मैं हुई बावरी

मन बन गया वृन्दावन ,
आंखें गोकुल की गालीयाँ,
राधा सी मैं हुई बावरी,
जब से गया मेरा कन्हीया,

कान्हा कान्हा पुँकार रही हूँ,
इन गोकुल की गलीयों में,
केशव बहुत सताया मुझको,
तेरी इन चंचल अंखीयों ने,

सब से है तू करे ठिठोली,
मुझसे ही न बोले है,
इतना तो बेपीर नहीं ,
फिर पीर ह्रदय की क्यों न जाने है,

विह्वल तेरे बिरह में कान्हा,
कुछ ऐसी तेरी राधे है,
शूलों से चुभते उसे ,
सखियों के उल्हानें हैं,
और तेरी देरी के भी तो ,
सूझे न इसे कोई बहाने हैं,

अब और देर न करना ,
सुन लो मेरे कान्हा तुम,
वरना हो जायेगी अब,
तेरी यह राधा गुम.

Sunday, May 31, 2009

सर्वस्व तुझ पे अर्पण किया


पुष्पों से श्रृंगार किया था ,
दूध से नहलाया था,
अपनी आस्था के दीपक से प्रतिदिन,
तेरा शिवालय सजाया था....

बाल मन की अंधभक्ति से,
युवा मन की आराधना तक,
सहज पलों के खुश लम्हों से ,
सिसकी भरी रातों तक,
कण कण में ढूँढा,कण कण पे शीश झुकाया..

मगर जीवन की आपा थापी ने मुझे झुलसा दिया,
तेरी आस्था के पुष्पों को कुछ ऐसा कुम्हला दिया ,
अब अश्कों से नहलाया है तुझको ,
व्यथाओं से श्रृंगार किया है ,
सिसकीयों का नाद भर,
दर्द का दीप प्रज्वलित किया ...

ग्लानी नहीं है मुझे ,
नही मैने कोई अपराध किया ,
जो भी मिला है तुझसे,
सर्वस्व तुझ पे अर्पण कर दिया ।

Saturday, April 18, 2009

एक पृथक मैं भी हूँ...

मृत पेड़ पर हरियाती हुई बेल हूँ मैं,
अंधेरे में टिमटिमाती हुई लौ भी हूँ,
थक कर चूर हुए उन हजारों मुसाफिरों में,
एक पृथक मैं भी हूँ....

चल रही हूँ मैं इसलिए नहीं की मुझ मैं सहास है,
लड़ रही हूँ मगर यह उत्साह की लड़ाई नहीं है,
निरंतर चलायमान है मेरा संघर्ष क्योंकि,
पलट कर लौटने के लिए कोई राह ही नहीं है.....

प्रतिभा की कमी किसी मैं नहीं होती ,
ना उसे कोई मिटा सकता है,
मगर वक्त के कठिन थपेडे इन्हे दबा देते हैं,
कुछ कर गुजरने का जस्बा ही मिटा देते हैं...

चींटी की तरह मैं भी बार बार गिरती हूँ पहाड़ से,
फिर चल पड़ती हूँ उसी चोटी को छूने,
क्यों कर रही हूँ ऐसा यह जानती नहीं,
शायद मंजिल तक जाने वाली कोई सरल राह ही नहीं,
और मंजिल भी क्या है यह आभास ही नहीं .....

सब कुछ वैसा ही है,
वही संघर्ष वही लड़ाई है,
मगर आपकी प्रितिभावान निधि,
वहीँ कहीं छूट आई है.....

दुनिया के लिए मिसाल बनूँ,
यह चाह ही कहाँ है,
जब किश्त किश्त में मिल रही है जिंदगी,
तो उस में सपनो की जगह ही कहाँ हैं......

Wednesday, February 18, 2009

सही निर्णय

भटकती राहों पर चल रही थी मैं,
धुंधली दिखने लगीं थी तस्वीरें ,
मझधार तक पहुंची तो लगा ,
खो गया है किनारा छूट रही हैं मंजिलें ....

टटोला अपने मन को और समेटा,
हुआ जो अब तक वो और कब तक होगा,
सहमा सा है मन मगर में जानती हूँ,
मेरा यह निर्णय सही ही होगा.....

उठी कई निगाहें मेरे निर्णय पे,
बहुत से सवालों ने सताया,
अपनों के ले लिए लिया है यह निर्णय,
मेरे मन ने मुझे समझाया.........

राह कठिन है मंजिल भी अनजानी,
निकल पड़ी हूँ मैं सहास की बांह थामी,
कभी लगा तनहा हूँ मैं ,
कैसे चलूंगी इतनी दूर,
पलट कर देखा तो मेरे अपने ,
सब मेरे साथ थे,
छोड़ गए जो मझधार में ,
वो कब मेरे हमसफ़र, मेरे दोस्त थे...

Tuesday, February 17, 2009

तन्हाई अपनी मेरी यादों से सजा रहा है...

खामोश है सारा जहाँ,

मगर हवाओं में एक संगीत है,

थिरक उठे हैं मेरे पाँव जिन पर,

किसने छेड़ा यह मधुर गीत है...

सुन रही है जो मेरी खामोशी,

किस की यह पद्चाप है,

ऐसा लगता है दूर से,

कोई दे रहा आवाज़ है ....

क्यों बार बार होता है आभास,

जैसे कोई मुझे बुला रहा है,

तनहाइ अपनी शायद ,

मेरी यादों से सजा रहा है.......